Home महिला जगत चक्रव्यूह – किसान की बेटियां – आशा भी, निराशा भी !

चक्रव्यूह – किसान की बेटियां – आशा भी, निराशा भी !

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यह सच है कि छोटे किसानों का परिवार बेहद अभावों में जीता है. कई प्रकार की मुसीबतों-मुश्किलों का सामना उन्हें करना पड़ता है. इसके बावजूद अगर गरीब किसानों की बेटियां जिला, राज्य या राष्ट्रीय स्तर पर चमकती हैं, किसी खास क्षेत्र में नाम कमाती हैं, तो उनके परिवार को भी गर्व होता है ….और देश को भी. हरियाणा के किसान और पहलवान महावीर फोगाट की बेटियों (गीता और बबीता) ने राष्ट्रीय-अंतरराष्ट्रीय कुश्ती में इतना नाम कमाया कि उन पर आमिर खान ने फिल्म ‘दंगल’ बना ली. उड़नपरी पीटी उषा ने भी कई मेडल जीतकर अपने परिवार का नाम रोशन किया. इसी वर्ष असम के रंजीत दास नामक किसान की बेटी सीमा दास ने अंतरराष्ट्रीय ओलंपिक स्पर्धा में 19 दिनों के भीतर 5 गोल्ड मेडल जीतकर परिवार और देश को गौरवान्वित किया है. सलाम है किसान की इन बेटियों को.

हिमा दास, धान पैदा करने वाले किसान रंजीत दास की बेटी है. वह अब तक सिर्फ दाल-चावल ही खाती रही. कभी बूस्ट, हॉर्लिक्स जैसे सप्लीमेंट्स या एक्स्ट्रा प्रोटीन नहीं खाया. वह ट्रैक पर दौड़ने से पहले अपने खेतों में दौड़ती रही. बहुत कष्ट सहे उसने और उसके गरीब परिवार ने. फिर भी वह 100, 200, 300 और 400 मीटर रिले रेस में पांच-पांच गोल्ड मेडल जीतने वाली पहली भारतीय धाविका बन गई. लेकिन दुर्भाग्य यह कि घर से भागकर दलित युवक (अजितेश नायक) से प्रेम-विवाह रचाने वाली विधायक (राकेश मिश्रा) की बेटी साक्षी मिश्रा की स्टोरी ‘ब्रेकिंग न्यूज़’ वाले चैनलों ने अपने प्राइम टाइम में दिखाई. वहीं, हिमा दास के कीर्तिमान को 5-10 सेकंड में ही निपटा दिया. चूंकि हिमा दास के पिता अमीर नहीं थे, विधायक नहीं थे, इसलिए उनकी बेटी हिमा के ‘कीर्तिमानों’ पर विधायक-पुत्री साक्षी के ‘कारनामे’ भारी पड़ गए. धिक्कार है मीडिया की ऐसी सोच पर….! इसी से साफ समझा जा सकता है कि अपने देश में ओलंपिक खेलों की क्या अवस्था होगी!

इतना होने पर भी हिमा दास ने अपने देश-प्रदेश के प्रति समर्पण नहीं छोड़ा और 5 गोल्ड मेडल्स की पुरस्कार राशि में से आधी कमाई असम के बाढ़ पीड़ितों के लिए दान कर दी. एक ओर करोड़ों रुपए कमाने वाले विराट-धोनी जैसे क्रिकेटरों की चर्चाएं इंग्लैंड में हुए वर्ल्डकप की हार के बावजूद हो रही हैं, वहीं हिमा दास को इतनी सुर्खियां नहीं मिलीं, जिसकी वह हकदार थी. कल तक हिमा दास को कोई नहीं जानता था, मगर आज वह विश्वविख्यात हो चुकी है. गरीब किसान की जिस बेटी के पास कभी स्पोर्ट्स शूज खरीदने के लिए पैसे नहीं थे ….और उस दौरान उसे नंगे पैर दौड़ना पड़ता था. आज वही हिमा दास ‘एडिडास’ की ब्रांड एम्बेसेडर बना दी गई है. गर्व है भारत की इस बेटी पर!

असम के किसान की इस गौरवशाली बेटी की आशावादी चर्चा के बीच, महाराष्ट्र के 3 गरीब किसानों की उन बेटियों की निराशावादी चर्चा भी यहां जरूरी है, जिन्होंने या तो अपनी जान दे दी, …या फिर बैलों के स्थान पर खेत में जुत गयीं. कर्ज और सूखे की मार झेल रहे परभणी के एक गरीब किसान ने बैल नहीं होने पर अपनी बेटियों और बेटे को ही हल चलाने जोत दिया. परभणी जिले के पिंगली (गांव) निवासी बाबूराव राठौड़ नामक किसान के पास ठेके की 7 एकड़ जमीन है. उसके पास बैल नहीं हैं. किराए पर लाने के लिए प्रति एकड़ एक हजार रुपए देने पड़ते हैं. बाबूराव की 5 बेटियां और एक बेटा है. धनाभाव में इन सभी ने पढ़ाई छोड़ दी है. पुस्तक-पेन की जगह इन्होंने हाथों और कंधों पर खेतों के औजार उठाकर और बिना जूते-चप्पल हल में जुत कर पिता का कर्ज चुकाने की ठान ली है. धन्य है वह मां, जिसने ऐसी बेटियां पैदा की.

वहीं, सोलापुर जिले के नरखेड़ निवासी गरीब किसान रामकृष्ण पवार की 20 वर्षीया बेटी रूपाली ने कीटनाशक पीकर इसलिए आत्महत्या कर ली, क्योंकि उसके पिता के पास जालंधर स्थित कॉलेज में बीटेक प्रथम वर्ष में प्रवेश के लिए एक लाख रुपए नहीं थे. इसके लिए किसान रामकृष्ण अपने खेत बेचने भी तैयार था, मगर समय पर उचित मूल्य देने वाला ग्राहक नहीं मिला. इस घटना से लातूर जिले में 11वीं कक्षा में पढ़ने वाली छात्रा स्वाति पिताले की याद ताजा हो गई, जिसने एसटी बस की मासिक पास बनवाने के लिए घर से मात्र 260 रुपए न मिलने पर आत्महत्या कर ली थी. महाराष्ट्र के गरीब किसानों की ऐसी दयनीय अवस्था और उनकी बेटियों की चीखें क्या हमारी गूंगी-अंधी-बहरी सरकार सुन पाएगी? जो विकास के नाम पर सिर्फ ढिंढोरा पीटती है! आखिर गरीब किसान-परिवारों की सुनवाई कहां होगी?

सुदर्शनचक्रधर ( संपर्क : 96899 26102)

शैक्षणिक परिशिष्ट