Home विविधा चक्रव्यूह- ‘रावण’ की चिट्ठी ‘कुंभकर्णों’ के नाम!

चक्रव्यूह- ‘रावण’ की चिट्ठी ‘कुंभकर्णों’ के नाम!

90
0
SHARE

चक्रव्यूह-  ‘रावण’ की चिट्ठी ‘कुंभकर्णों’ के नाम!*

sudarshan chakradhan
( विशेष सूचना : महाबलशाली और अहंकारी आधुनिक रावण की एक चिट्ठी दशहरा के खास अवसर पर वर्तमान कुंभकर्णों के नाम लिखी गई है. कृपया इसमें ‘रावण को सरकार’ और ‘कुंभकर्णों को देश की जनता’ ना समझा जाए. – लेखक)
मेरे प्यारे कुंभकर्णों (देशवासियों),
आशा है आप स्वस्थ एवं सानंद होंगे और अपनी आदत के अनुसार लंबी चादर तान कर सो रहे होंगे. आपको तो सोते रहने के अलावा और कोई काम भी नहीं है. वैसे आपको जगाना हमारा कोई मकसद भी नहीं है. क्योंकि आप जाग गए तो हमारा वजूद खतरे में पड़ जाएगा. इसीलिए आपके सोये रहने में ही हमारी भलाई है.
        भाइयों (और बहनों), आपको यह जानकर बड़ी प्रसन्नता होगी कि देश में सब अच्छा है. सब कुशल मंगल है. यह बात अमेरिका के ह्यूस्टन में भी आठ-आठ भाषाओं में कहीं जा चुकी है. भले ही यहां मंदी छा गई है.कई लोगों की आमदनी खत्म हो गई है. कई कंपनियां बंद हो चुकी हैं. लाखों युवाओं का रोजगार छिन गया है, बेरोजगारी बढ़ गई है, निर्यात घट गया है, पेट्रोल डीजल के दाम बेतहाशा बढ़ गए हैं  और महंगाई ‘सुरसा’ की तरह मुंह फाड़ चुकी है! फिर भी हमारा दावा है कि ‘जीडीपी’ कंट्रोल में है और अर्थव्यवस्था मजबूत है. इसीलिए हे चतुरवर्ण… मेरे भाई कुंभकर्ण, तुम सोते ही रहो! अगर तुम जाग गए, तो मेरा वर्षों से जमा जमाया राजपाट संकट में आ जाएगा. क्योंकि तुम्हारी निद्रावस्था में ही मैं चालाकी से देश पर शासन करना, राज करना सीख गया हूं!
         प्रिय बंधुवर, भले ही अपने देश में बेरोजगारी बढ़ रही है, लेकिन हम अपने युवाओं को राष्ट्रवाद के जाल में उलझा कर रखे हुए हैं. हर बार की तरह हमने इस बार भी नई-नई नौकरियां देने का लालीपाप अपने युवाओं को थमा दिया है. ‘छद्म राष्ट्रवाद का गान’ और दिन भर ‘नापाक भोंपुओं’ को बजा कर हम देश की मूलभूत समस्याओं को सामने आने ही नहीं देते. भले ही अफसल, अतिवर्षा, कर्ज और अन्य संकटों में फंसे किसान आत्महत्या कर रहे हैं, मगर हम उन्हें कर्ज-मुक्ति का आश्वासन तो दे ही रहे हैं. कई के खाते में हमने दो-दो, चार-चार हजार रुपए डलवा भी दिए हैं. हम उज्वला योजना और आयुष्मान भारत के जाल में भी सबको फांस रहे हैं. हमने जीएसटी के जादू से व्यापारियों को भी लपेट रखा है. इस तरह हमारे राज में सब लोग ‘खा-पी कर’ संतुष्ट हैं, सुखी हैं, लेकिन कुछ विरोधी जागृत होकर हल्ला शोर मचा रहे हैं. फिर भी तुम्हें जागने की कोई जरूरत नहीं है. तुम सोये ही रहो भाई!
       आगे समाचार यह है कि हमारे राज में बड़ी-बड़ी दुर्घटनाएं हो जाती हैं. सुशासन बाढ़ में डूब जाता है. आंदोलनकारियों को लाठी-डंडों से पीटा जाता है. आतंकवाद को हम समूल नष्ट करने पर आमादा हैं. हमने अपने पड़ोसी को भी अच्छा सबक सिखाया है. वह जानता नहीं कि हर मामले में हम उसके ‘बाप’ हैं! यह तो सब जानते हैं कि हमसे बड़ा ‘आतंकवादी’ इस दुनिया में दूसरा कोई हो ही नहीं सकता. और बड़ी बात यह कि हम फिलहाल ‘सत्ताधीश’ हैं. इसलिए पूरी ईमानदारी से देश बदल रहे हैं. ‘विकास’ की नई ऊंचाइयां छू रहे हैं. आशा है कि आप सुसुप्तावस्था में 70 साल जैसे ही मंगलमय होंगे!
          *हे वोटों के हरजाई… मेरे भाई, इन दिनों कुछ ‘पुरूष’ मेरे जैसे ‘महापुरुष’ का विरोध कर रहे हैं. वे मेरे पुतले जलाने पर आमादा हैं. मेरे झूठ, मेरी नौटंकी और मेरे आडंबर पर खिलखिला रहे हैं. इनकी तो आदत है हर साल मुझे मारने की, जलाने की… लेकिन मैं कभी मरता नहीं हूं भाई! मेरी वृत्ति और प्रवृत्ति को कोई नहीं मार सकता! मैं हर युग में जीवित था, जीवित हूं और जीवित ही रहूंगा! यह भी कैसी विडंबना है कि मेरा घमंड, मेरी नीतियां और मेरी तानाशाही … आज भी सत्ता की कुर्सी से तुम्हारी मातमकुर्सी तक कई रूपों में जिंदा है…. और ‘वो’ राम, मेरे अधूरे कत्ल के जुर्म में आज तक शर्मिंदा है! इसलिए हे कुंभकर्ण, चिंता छोड़ो और ऐसे ही सोते रहो. मैं हूं ना! अतः मुझे नहीं, बल्कि मेरी नीयत और नीतियों को जलाएं, बुराइयां जलाकर दशहरा मनाएं …. मेरी हार्दिक शुभकामनाएं.*
-आपका भाई,
 *’सत्ताधीश रावण’*