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जिन्दगी : अर्जुन की पीड़ा

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जिन्दगी : अर्जुन की पीड़ा

Neera Bhasinइसमें  संदेह नहीं है की कौरव धन संपदा और राज्य के लालच में अंधे हो चुके हैं ,वे शायद यह देख  नहीं पा रहे की यदि यह युद्ध होता है  तो
समाज की सारी व्यवस्था ही अस्त व्यस्त हो जाएगी। कौरवों की बुद्धि  को लगता है अज्ञान के बादलों ने पूरी तरह से ढक लिया है इसलिए अपने ही परिजनों  वद्ध करने में उन्हें कोई भय प्रतीत नहीं हो रहा (भय या फिर ह्रदय का द्रवित होना )इसलिए अर्जुन यहाँ तर्क कर कहता है यदि दुर्योधन और उसके मित्र युद्ध के परिणाम को देख कर भी अनदेखा कर रहे हैं तो क्या यह उसका  कर्तव्य नहीं की वह स्वयं हथियार डाल दे। 
 “active resistance to evil ” is the central the idea in the doctrine expounded by Krishna in the Geeta.
                                             —–Swamy Chinmaynanda 
यदि किसी परिवार का विनाश किया जाता है तो उसके साथ सदियों से चली आ रही परम्पराओं का भी नाश हो जाता 
है। एक ओर संयुक्त परिवार धर्म और संस्कारों को आगे बढ़ाने के लिए सक्षम हैं तो दूसरी और छोटी -छोटी इकाइयों में  बंटे हुए परिवार ऐसा करने में असफल हैं। महाभारत का युद्ध एक राज्य परिवार 
के विभाजन का कारण बन गया। यह युद्ध स्वार्थ से भरा था और इसने 
विवेक बुद्धि को नष्ट कर दिया था। कौरव अपने राजमद में इतने विवेकहीन हो गए की क्षत्रिय होते हुए भी युद्ध के परिणामों को नकारते रहे   लोभ ,अहंकार ,विलासिता और संग्रह की प्रबल इच्छा मनुष्य को लालची बना देती है —सोचने समझने की शक्ति होते हुए भी स्वार्थ भारी  पड़ जाता है। “हमें कोई परास्त करे यह हो ही नहीं सकता ” यह एक ऐसी विकृत सोच है जिसे अहंकारी वयक्ति अपने जीवन का जूनून बना लेता है। इसके परिणाम तो रोज ही देखने को मिलते हैं। यह तब भी थे और आज भी देखे जा सकते हैं। दुर्योधन भूल गया था की वे सब एक ही परिवार के स्वजन हैं। 
                       यहाँ पर कृष्ण यदि चाहते तो कह सकते थे की दुर्योधन अर्जुन को अपना स्वजन नहीं मानता है। वो धरती का एक छोटा सा टुकड़ा भी उसे नहीं देगा। वो तो अर्जुन को अपने घर में आया एक 
घुसपैठिया मानता है। अर्जुन तुम तो एक गांव ले कर ही तृप्त हो जाते पर दुर्योधन तो उतना भी नहीं देना चाहता। तुम तोधर्म के रक्षक हो 
और यदि तुम ही धर्म की रक्षा करने में पीछे हट जाओगे तो यह अन्याय होगा —–कंयोकि अर्जुन कृष्ण से कुछ ऐसे ही उत्तर की अपेक्षा कर रहा था। पर कृष्ण मौन थे।  कोई कितना भी पढ़ालिखा हो ,बुद्धिमान हो पर मन 
में लालच आ जाने से बुद्धि  और ज्ञान गौण हो जाते हैं। अच्छे और बुरे 
का भेद पता नहीं चलता। यहाँ धृतराष्ट्र भी लालच में पड़ कर अच्छे और  बुरे ,सही और गलत का भेद भूल चूका है ,अपने लालच के आगे उसे परिवार का विनाश दिखाई नहीं दे रहा। अर्जुन कृष्ण से जानना 
चाहता है की जब उसे इस युद्ध में विनाश और पाप ही पाप दिखाई दे रहा है तो क्या उसके लिए युद्ध का विचार त्याग देना ही उचित न होगा। 
चालीसवें श्लोक में लिखा है की यदि कुटुंब का नाश होता है तो उसके साथ वर्षों से चली आरही धर्म वयवस्था का भी नाश हो जाता है जब धर्म का नाश हो जायेगा तो सारा कुटुंब अधरम की राह पर चल पड़ता है । जिन्हों ने युद्ध में भाग नहीं लिया वे दिशा हींन हो जाएँगे 
और  अधरम की राह पर चल पड़ेंगे ,इस समय अर्जुन की कही ये बात बिलकुल सही जान पड़ती है। 
      श्लोक ४१,४२,४३ ——इसके बारे में स्वंय चिन्मयनन्दा ने कहा है 
                         “When the general morality of society has decayed ,the young men and women ,blinded by 
uncotrolled passion ,start mingling without restraint and lust knows no logic and cares least for better evolution or 
better culture .there will be thereafter unhealthy intermingling of incompatible culture traits .” आज देश कुछ 
ऐसे ही मोड़ पर खड़ा है। किसी भी समाज की जड़ें तभी तक मजबूत पकड़ बनाती हैं जब तक उसे स्त्रींयो का बल मिलता रहे। परिवार 
की धर्म की वर्ण की ,आश्रम की सबकी व्यवस्था तहस नहस हो जाएगी 
यदि स्त्री वर्ग कमजोर पड़ गया तो। धर्म की संस्थापना करने में स्त्रींयो 
का योगदान भी उतना ही अनिवार्य है जितना पुरषों का और यदि 
धर्म का विनाश होता है तो उसका सबसे पहला और बड़ा प्रभाव स्त्रींयो पर ही पड़ेगा ,तब अधर्म को बढ़ने से कोई नहीं रोक सकता। यह बात तो हर युग में अपना प्रभाव दिखती रही है और दिखाती रहेगी।