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जिन्दगी : ” मोक्ष ” गीता पड़ने से मोक्ष की प्राप्ति होती है ?

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moksha
Neera Bhasinमोक्ष प्राप्त करना ,अर्थात किससे छुटकारा पाना है।  मोक्ष की  राह पर चलने वाले बहुत कम लोग होते हैं। पीढ़ियों में कोई  एक ऐसा करने की सोचता है. मोक्ष पाने के लिए इंसान के अंदर सुंदरता को परखने की दृष्टि चाहिए। ,ज्ञान और परिपक्वता चाहिए ,
जीवन के उतार चढ़ाव को सफलतापूर्वक निभा लेने की क्षमता चाहिए –जीवन का सच तो यह है की सभी लोग किसी न किसी से छुटकारा पाना चाहते हैं -दैहिक दैविक ,भौतिक आर्थिक आदि समस्यांओ से ,इसके लिए वे निरंतर प्रयत्न शील भी रहते हैं और व्यवाहरिक बंधनो की तो गिनती ही नहीं की जा सकती ,हमारे पास बहुत कुछ ऐसा है जिससे हम मुक्ति पाना चाहते हैं अर्थात छुटकारा पाना चाहते हैं। जब हमारे किसी प्रयत्न से हमको व हमारी अंतरात्मा को प्रस्सनता मिलती है या संतुष्टि मिलती है तो हमको  अमुक परिस्तिथि से मोक्ष मिलता है। इसे दूसरे शब्दों में हम भौतिक मोक्ष कह सकते हैं। और ऐसी घटनाएं जीवन में एक के बाद एक आती रहती हैं,इनका अंत नहीं है और हम कभी संतुष्ट भी नहीं हो पाते ,लेकिन इन बाधाओं से पार पा  लेना मोक्ष नहीं है। 
                 
मनुष्य सदा अर्थ ,काम, और धर्म के पीछे भागता है ,खोजता है पा भी लेता है ,पर क्या यही सच्ची खोज है। मनुष्य अपने जीवन में स्वयं को सुरक्षित करने का –रखने का प्रयत्न करता है अर्थात किसी तरह की भी असुरक्षता से दूर रहना चाहता है या दूसरे शब्दों में हम कह सकते हैं की वो अपने मन के उस भय से मुक्ति पाना चाहता है जिसमें वो सदा अपने को असुरक्षित महसूस करता है। प्रत्येक इंसान की अपनी कुछ कमिंयाँ होती हैं –वो  धन दौलत ,घर बांग्ला,जमीन जायदाद स्वास्थ्य आदि को सुरक्षा का पर्याय मानता है ,लेकिन फिर भी मन से असुरक्षा की भावना जाती नहीं। इन सब की चाह का कोई अंत नहीं ,हम जितना इनके पीछे भागेंगे ये उतना ही लुभाती हैं ,तृष्णा समाप्त ही नहीं होती। प्रश्न यह है की क्या इच्छा पूरी करते रहना ही मोक्ष प्राप्ति की  राह है ,या सोचते रहना की एक दिन ऐसा भी आएगा की हमारी सब इच्छाँए पूरी हो जाएगी और हमें मोक्ष की प्राप्ति होगी। शायद नहीं -ये अहंकार की जननी हैं ,दिखावे की दौलत है ,आग में जितना भी ईंधन डालें उसने कभी नहीं कहा “बस “बहुत हो गया वैसे ही भौतिक इच्छाओं को जितना भी प्राप्त करो -वो कम  नहीं होती।
सुरक्षा +असुरक्षा =सुरक्षा नहीं है ,इसका उत्तर है दुगनी असुरक्षा 
 
                                       
अर्थ धर्म काम इनसे मोक्ष नहीं मिलता पर जो मोक्ष से मिलता है वो इन सबसे नहीं मिलता। पर एक बात संभव है की जिसे मोक्ष प्राप्त हो चुका है वो निर्लिप्त भाव से इस व्यवहार को  कर्तव्य समझ के निभा सकता है —-यदि उसे करना पड़े तो।
हम जब भी कोई  प्रार्थना करते हैं  तो वो अपनी भौतिक इच्छांओं की पूर्ति के लिए करते हैं। ईश्वर के लिए नहीं 
हम जानते हैं की वो तो  असहाय या असुरक्षित है ही नहीं —  हम हैं ,हमारी इच्छाएँ अधूरी हैं। प्रार्थना से हम उस अदृश्य शक्ति का आवाहन 
करते हैं जो हमारी भौतिक इच्छा की पूर्ति करे। हमारे सारे  प्रयत्न हमारी सांसारिक इच्छा पूर्ति के लिए होते हैं। एक इच्छा पूरी हुई नहीं की दूसरी सामने आ जाती है और हम सदा एक उलझन का शिकार बने ही रहते हैं —–कह सकते है दुनिया का यही चलन है और हम ऐसा करते रहते हैं। पर यह मोक्ष का मार्ग कदापि नहीं है। 
      ज्ञान —- संक्षेप में कहें तो हम जो देखते हैं सुनते हैं जिसे हमारी इन्द्रियां होने या न होने का आभास कराती हैं वही हमारे ज्ञान का स्रोत्र हैं
स्वामी दयानन्द जी ने अपनी पुस्तक Bhagvat Geeta Home Study में लिखा है
“The basic means of knowledge available to me for knowing things other than myself is Perception. But the self, myself cannot be an object of perception like sound (Shabd ) touch (Sparsh) a form or color (roop)a taste (rasa), or a smell (gandha).Only those objects which have the attributes of sound, form or color, smell, taste, and touch can be known as objects of my senses; whereas the self is the one who uses the means of knowledge to know myself .”
हम अपने को असुरक्षित मानते हैं क्न्योकि हम अज्ञानी हैं। 
                 “अज्ञान के अंधकार को ज्ञान ही मिटा सकता है और ज्ञान –ज्ञान के स्रोत्र से प्राप्त होता है अचानक ही कहीं पड़ा नहीं मिल जाता। 
अविष्कारों की खोज करते हैं तो कभी कभी इस कार्य की सफलता में वर्षों लग जाते हैं तो कभी “पेंसलीन” जैसी उपलब्धि अकस्मात् ही हो जाती है। लेकिन प्रयत्न तो करना पड़ेगा।