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न्यायालय को मज़ाक समझने वाले हैं सकते में ! तीन करोड़ केस प्रलंबित

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जलगाँव ( विक्रांत राय ) – गत 31 अगस्त को देश भर में बहुचर्चित जलगाँव के आवास घोटाले  ( घरकुल ) का न्यायालयीन फैसला घोषित हुआ . यह भ्रष्टाचार के खिलाफ सज़ा के साथ करोंड़ों की वसूली का शायद पहला मामला होगा. इस अनपेक्षित फैसले से सामान्य जन व न्याय व्यवस्था में विशवास रखने वालों की न्याय पालिका  प्रति आस्था बढ़ी है. वहीँ जो लोग अब तक न्याय व्यवस्था का मज़ाक उड़ाते हुए कोर्ट परिसर में खड़े हो कर पैसे के घमंड में यह कहते हैं कि कुछ नहीं होता ऐसे केसों से , हमारे वकील ने कहा है केस में कोई दम नहीं है.

हो सकता है न्यायालय व्यवस्था में कर्मचारी वर्ग, वकील वर्ग कागजी चतुराई से कुछ समय के लिए केस को प्रभावित कर देते होंगें. लेकिन देर सबेर ही क्यों न हो शिकायतकर्ता यां पीड़ित को न्याय मिलता है.फिलहाल तो घरकुल घोटाले के ऐतिहासिक परिणाम से सबक लेने की आवश्यकता है. इस मामले में भी मुख्य आरोपी सहित अन्य सभी भी यही दंभ भरा करते थे की देख लेंगें…. कुछ नहीं होता ऐसे केसों से…, किन्तु कई वर्षों बाद न्याय प्रक्रिया ने उन्ही कागजों को आधार बनाकर दबंग सरीखे नेताओं को जेल की सलाखों के पीछे धकेल दिया.

न्याय प्रक्रिया में जहां एक और आरोपियों को जमानत के लिए ऊपर के कोर्ट में जाने का अधिकार है वहीँ दूसरी और पीढित को भी न्याय मांगने के लिए ऊपर कोर्ट में जाने का अधिकार है. पैसे के घमंड में पढ़े लिखे प्रोफ़ेसर, डाक्टर इंजिनियर जैसे लोग खुले आम “कुछ नहीं होता….” का राग आलापते हैं. लेकिन कहीं न कही उन्हें आरोपी होने का मलाल भी रहता ही होगा.  ऐसे में खुद को चतुर मानने वाले कुछ लोग तो अपना पेशा छोड़कर लॉ कॉलेज में प्रवेश लेकर वकील बन अपने ही केसों को जितने का सपना पालने लगते हैं.

तीन करोड़ से अधिक केस प्रलंबित – 

देश भर में न्यायिक प्रक्रिया में चल रहे केसों के बारे में देखें तो राष्ट्रिय स्तर पर सरकारी डेटा के अनुसार आज की स्थिति में देश भर में कुल तीन करोड़ ग्यारह लाख सत्तावन हज़ार चार सौ चवालीस ( 31157444 )  केस न्याय के लिए प्रलंबित हैं. इनमे से दो करोड़ छब्बीस लाख तिरसठ हज़ार तीन सौ चौदह केस ( 22663314 ) एक वर्ष से अधिक समय के न्याय प्रविष्ट हैं. इस आंकड़े में दो करोड़ बाईस लाख इकहत्तर हज़ार सात सौ बाईस (22271722) क्रिमिनल  केस हैं.

महाराष्ट्र में पच्चीस लाख क्रिमिनल केस –

महाराष्ट्र अकेले में कुल सैंतीस लाख अठ्ठाइस हज़ार सात सौ उनहत्तर केस ( 3728769 ) न्याय प्रविष्ट पड़े हैं. महाराष्ट्र में पच्चीस लाख इक्कीस हज़ार नौ सौ अठ्ठारह  (2521918) क्रिमिनल  केस हैं.

जलगाँव में बयासी हज़ार केस पेंडिंग –

जलगाँव में न्याय प्रक्रिया का मखौल उड़ाने वाले लोगों को पता होना चाहिए कि जिला न्यायलय व जिले के सभी न्यायलय को मिलाकर इस समय कुल बयासी हज़ार सत्ताईस (82027) केस न्याय प्रविष्ट हैं. इनमे बावन हज़ार तीन सौ छियासठ (52366) क्रिमिनल  केस हैं. जबकि उनतीस हज़ार छह सौ इकसठ ( 29661 ) सिविल केस पेंडिंग पड़े हुए हैं.

46 साल पुराना मामला हैं पेंडिंग – 

जलगाँव के न्याय प्रविष्ट मामलों पर नज़र डालें तो सिविल व क्रिमिनल मिलाकर कुल 144 मामले पिछले तीस वर्ष से अधिक समय से न्याय प्रविष्ट हैं. इनमें वर्ष 1973 के दो सिविल व वर्ष 1978 का एक क्रिमिनल मामला अभी भी चल रहा है.  इन तीस वर्ष से अधिक केसों में कुल छियालीस सिविल व अट्ठानबे क्रिमिनल मामले जलगाँव जिले में प्रलंबित हैं.

जामनेर के 42 वर्ष पुराने मामले की तारीख इसी माह में – 

सिविल जज जूनियर डिवीजन, जामनेर के अंतर्गत वर्ष 1978 का मामला जिले का सबसे पुराना मामला है. 17 जनवरी 1978 को राजिस्ट्रेशन क्रमांक  1400026/1978 के रूप में यह मामला सरकार की ओर से सुभाष नानाजी के खिलाफ धारा 467 व 468 के रूप में दाखिल किया गया था. यह मामला सुप्त केस के रूप में उल्लेखित है . जामनेर पुलिस स्टेशन में वर्ष 1977 में एफ आई आर क्रमांक 30 के रूप में यह शिकायत दर्ज़ की गई थी. इस मामले की पहली सुनवाई 04 मार्च 2013 को हुई थी . इस सुप्त केस में अभी भी तारीख पर तारीख जारी है. विशेष बात यह है क़ी इस माह की 26 सितंबर 2019 को मामले की अगली तारीख है. विगत 01 जुलाई 2019 को इसी केस की अंतिम सुनवाई – तारीख थी.

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बावन हज़ार तीन सौ छियासठ ( 52366 ) क्रिमिनल  केस – 

जलगाँव के प्रलंबित पड़े क्रिमिनल न्यायिक मामलों में सर्वाधिक 12154 मामले वर्ष 2018 के हैं. वर्ष क्रमवार जलगाँव के 1980 में 3, 1981 में  4, 1981 में  4, 1982 में 4, 1983 में 7, वर्ष 1984 में 16, 1985 में 17, वर्ष 1986 में 16, वर्ष 1987 में 12, 1988  में 18, 1989 – 19, वर्ष 1990  में 27,1991 में  27, 1992 में  21, 1993 में  30, 1994 में 31, 1995 में  27, वर्ष 1996 में  36, 1997  में 22, वर्ष1998 में  30, वर्ष 1999 में  34 , 2000 में  53, वर्ष  2001 में 93, वर्ष  2002 में 52, वर्ष 2003 में  78,  2004 में  110, 2005 में 180,  वर्ष 2006 में 189, 2007 में 221, 2008 में 372 , वर्ष 2009 में 425, वर्ष 2010 में 596, 2011 में 999, वर्ष 2012 में 1209, वर्ष 2013 में 1924, 2014 में 3101, 2015 में 4261, 2016 में  6994, 2017 में  8832, वर्ष  2018 में 12154, वर्ष  2019 में  10121 क्रिमिनल न्यायिक मामले प्रमुख हैं.

देर है अंधेर नहीं – 

घरकुल घोटाले में धुलिया न्यायालय द्वारा आरोपियों को सजा सुनाते हुए एतिहासिक फैसला सुनाया. इस फैसले में कारागृह सजा के अलावा सर्वाधिक सौ करोड़ व अन्य चालीस करोड़ से लेकर एक लाख तक का आर्थिक दंड भी लगाया. वर्षों तक न्यायालय में “कुछ नहीं होता….” का गीत दोहराने वाले अब अच्छी तरह समझ लें कि न्याय देर से मिलता है लेकिन अन्याय नहीं होता.

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