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छपाक, छपास और विवाद

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दो शब्द हैं, छपाक और छपास। इनका उपयोग बहुत आम है। इन दिनों दोनों ही मीडिया में खासा स्पेस बटोर रहे हैं। ऐसे त्रिभुज की कल्पना करें जिसके तीन कोण छपाक, छपास और दीपिका हैं। दीपिका पादुकोण की ताजा फिल्म छपाक है। दीपिका हिंदी फिल्मों की लोकप्रिय अभिनेत्रियों में हैं, स्वाभाविक है कि छपाक की चर्चा होगी। बाक्स आफिस पर इसके रुतबे का फैसला अवश्य समय करेगा। अब सवाल यह है कि दीपिका और छपास के बीच क्या संबंध है? हाल ही में मीडियाई बहसों में छपास शब्द की धूम देखी गई। छपाक के रिलीज से पहले प्रमोशन कैम्पेन पर निकलीं दीपिका पादुकोण जेएनयू में हिंसक घटना के विरोध में छात्रों के एक वर्ग की सभा में जा पहुंचीं। इसके बाद बहसों में छपास शब्द गूंजने लगा। कुछ लोगों को सभा में दीपिका के जाने पर कोई बुराई नहीं दिखी। वो उनके साहस पर दाद दे रहे हैं। एक अन्य वर्ग मानता है कि दीपिका ने जाने-अनजाने में टुकड़े-टुकड़े गैंग का हौसला बढ़ाया है। इधर, बहिष्कार और समर्थन के आह्वानों के  बीच छपाक रिलीज हो गई। भारतीय राजनीति और फिल्मों के इतिहास में पहली बार नई बात सामने आई। फिल्म के बहिष्कार के आह्वान पहले भी होते रहे हैं लेकिन पहली बार राजनेताओं का एक वर्ग किसी फिल्म की कामयाबी के लिए ऐड़ी-चोटी एक किए दिखा। रिपोर्टों के अनुसार लखनऊ में समाजवादी पार्टी ने सिनेमाघर बुक कर लोगों को मुफ्त में छपाक दिखाई। एनएसयूआई के सदस्य द्वारा छपाक की टिकट मुफ्त बाटे जाने की खबर भी सुनी गई।

जेएनयू के छात्रों की सभा में दीपिका पादुकोण कुछ बोलीं नहीं। उनकी मौन-मौजूदगी के अपने अर्थ हैं। छात्र  कह रहे हैं दीपिका ने छात्रों पर हुए हमले का विरोध किया है और वह उनका साथ देने आईं थीं। इस दावे को खारिज नहीं किया जा सकता। दूसरी ओर, आलोचकों के अनुसार दीपिका चतुर प्रचारक हैं। मौका भुनाना उन्हें आता है। मुद्दा यह है कि दीपिका ने सभा में जाने का फैसला खुद लिया था या यह आइडिया किसी और का था? उन्हें छपाक या छपास में से किसके लिए जमावड़ा अनुकूल दिखा? नि:संदेह यह एक सधी पीआर कवायद थी। यानि, आम के आम और गुठलियों के दाम। असर दिखने लगा है। दीपिका अचानक कांग्रेस, वामदल और मोदी सरकार विरोधी लॉबी और पाकिस्तानियों की चहेती बन गईं। ऐसी पब्लिसिटी लाखों फूंक कर भी संंभव थी? दीपिका को हौसला बढ़ाने के लिए मोदी विरोधी टूट पड़े हैं। ट्वीटर पर  उनके फालोअर्स की संख्या में 40 हजार का उछाल है। यहां एक तीसरा वर्ग भी है। उसे छपाक फिल्म से कोई शिकायत नहीं थी। उसे भारत तेरे टुकड़े होंंगे जैसे देश विरोधी नारे लगाने वालों के साथ दीपिका का मंच साक्षा करना नागवार गुजरा है। छपाक के बहिष्कार के बात यहीं से शुरू हुई। बहिष्कार आह्वान के पीछे पुख्ता तर्क  हैं। सभा की तस्वीरें देखें। दीपिका के साथ कन्हैया कुमार दिखाई देता है। वह नारे लगा रहा है। सिर झुकाये मुग्ध दीपिका छपास के कल्पना-लोक में गोते से लगाते महसूस की जा सकतीं हैं। क्या कन्हैया पर आरोपों से दीपिका अनभिज्ञ थीं? उनकी इस मौन-मौजूदगी से ईमानदारी से पढऩे और पढ़ाने वालों को निराशा हुई है।

फिल्मी पंडित मानते हैं कि छपाक के हिट होने के आसार हंै। ऐसी भविष्यवाणियों गलत भी साबित होती रहीं हैं। औसत कारोबार की संभावना से इंकार नहीं किया जा सकता। चार कांग्रेस शासित राज्यों ने बेहद कमजोर तर्कों के साथ छपाक को टैक्स फ्री कर दिया। क्या यह एक तरह से दीपिका को पुरस्कार जैसी बात नहीं हैै? कांग्रेस छपाक को फ्लाप नहीं होने देना चाहती। कांग्रेस के साथ वामपंथी और सपाई खड़े हैं। दीपिका के लिए दोनों हाथों में लड्डू वाली बात हो गई। बहरहाल, यहां छपाक और छपास की संक्षिप्त व्याख्या उचित होगी। छपाक क्या है? छपाक वह ध्वनि है जो किसी तरल पदार्थ पर चोट करने से उठती है। शायद ही कोई छपाक से अपरिचित होगा। किसी पर तरल पदार्थ तेजी से फेंकने से भी यह ध्वनि उठती है। बाल्टी में भरे पानी या सरोवर में भी इसे सुना जा सकता है। यह एक अलग अनुभव होता है। दूसरा शब्द छपास है। प्रेमरोग सरीखी अनुभूति देने वाले छपास की महिमा अपार है। आये दिन अपना नाम छपवाने के लिए अखबारों के दफ्तरों में मंडराने वालों के संदर्भ में कटाक्ष के रूप में इसका उपयोग किया जाता रहा है। वैसे छपास का प्रभाव अब समूचे मीडिया  में दिखाई देता है। समाज के सभी वर्गों में छपास के प्रति मोह व्याप्त दिखता है। अत: सिल्वर स्क्रीन से दर्शकों को चुधिंया देने वाले स्टारों तक यह प्रेमरोग फैला दिख रहा है तो आश्चर्य क्यों?

पूरे विवाद पर दीपिका पादुकोण की ओर से रहस्यमयी चुप्पी बनी रही। इसे अवश्य चौंकाने वाली बात कह सकते हंै। चुप्पी और दीपिका, कोई मेल नहीं हो सकता। विवाद पर पलटवार की मुद्रा वह अपनाती रहीं हैं। बात निहार पंडया, युवराज, रनवीर, सिद्धार्थ माल्या के संदर्भ में कतई नहीं की जा रही है। बात रणबीर सिंह की भी नहीं है। याद करें क्लीवेज कंट्रोवर्सी पर उनके ट्वीट को, क्या उसे भुलाया जा सकता है। एक टीवी शो के दौरान किसी के लिए कंडोम ब्रांड एंडोर्स करने का सुझाव, उनकी बेबाकी साबित करता है। 2015 में शार्ट फिल्म माय बॉडी, माय माइंड, माय च्वाइस भी एक मजबूत उदाहरण रहा है। इनसे दीपिका के मिजाज को समझ सकते हैं। कहना सिर्फ इतना है कि आपके मिजाज से किसी को लेना-देना नहीं लेकिन आप एक सेलीब्रेटी हैं, कुछ कदम फंूक कर उठाने की अपेक्षा आपसे की जा सकती है।

 

अनिल बिहारी श्रीवास्तव,

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