Home महिला जगत साहित्य एवं चिंतन – प्रतिभा सम्पन्न युवा लेखिका डॉ. सुजाता मिश्र

साहित्य एवं चिंतन – प्रतिभा सम्पन्न युवा लेखिका डॉ. सुजाता मिश्र

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सागर नगर की साहित्य-उर्वरा भूमि प्रत्येक उस व्यक्ति को विशेष लेखकीय परिवेश प्रदान करती है जो साहित्य सृजन से जुड़ा हुआ हो, फिर चाहे उसका जन्म सागर में हुआ हो अथवा न हुआ हो, साहित्यिक कर्मभूमि के रूप में सागर की साहित्यिकता उस व्यक्ति के जीवन में समाहित होने की क्षमता रखती है. यह तथ्य दिल्ली में जन्मीं डॉ. सुजाता मिश्र पर भी अक्षरशः खरा उतरता है. दिल्ली में निवासरत् प्रो. रामेश्वर मिश्र “पंकज“ एवं डॉ. अन्नपूर्णा मिश्र की पुत्री के रूप में 30 जून 1985 को जन्मीं सुजाता मिश्र ने अपने परिवार में एक वैचारिक एवं दार्शनिक परिवेश पाया. उनके पिता रामेश्वर मिश्र “पंकज“ गांधीवादी ,राष्ट्रवादी चिंतक तथा दार्शनिक हैं जिनके विचारों का प्रभाव सुजाता के चिंतन पर पड़ा. वहीं उनकी मां डॉ. अन्नपूर्णा मिश्र राजनीति एवे समाजसेवा में रुचि रखने वाली महिला हैं. वे वर्ष 2007 – 2014 तक सोनिया विहार दिल्ली की निगम पार्षद रही, साथ ही वर्ष 2012 में पूर्वी नगर निगम दिल्ली की प्रथम मेयर भी रही. सुजाता ने अपनी मां से राजनीतिक समझ एवं समाज की विडम्बनाओं को देखने, परखने की क्षमता प्राप्त की. शैक्षिक एवं राजनीति के मिश्रित वातावरण में पली-बढ़ीं सुजाता मिश्र के भाई कपिल मिश्र दिल्ली से विधायक तथा लोकप्रिय नेता हैं. जबकि सुजाता के श्वसुर प्रोफ़. डॉ. नंदकिशोर प्रसाद सिंह, बिहार विश्वविद्यालय से वनस्पति शास्त्र के व्याख्याता पद से सेवानिवृत्त हुए. परिवार में साहित्यसृजन के प्रति रुचि भी रही जिसने सुजाता मिश्र की भावनाओं में साहित्यिकता के बीज बोए.

सुजाता मिश्र ने विद्यालयीन शिक्षा के पश्चात् दिल्ली के ही हंसराज कॉलेज से बी.ए. हिंदी (आनर्स) में स्नातक किया और इसके बाद दिल्ली विश्वविद्यालय से हिंदी साहित्य में एम.ए. की उपाधि प्राप्त की. वर्ष 2008 में स्थान परिवर्तन हुआ और वे दिल्ली से भोपाल आ गईं. भोपाल में बरकतुल्ला विश्वविद्यालय से प्रसिद्ध आलोचक आचार्य विनय मोहन शर्मा के व्यक्तित्व एवं कृतित्व पर शोध कार्य किया. जैसा कि डॉ. सुजाता मिश्र ने जानकारी दी कि आचार्य विनय मोहन शर्मा के साहित्यिक और निजी जीवन पर आधारित अभी तक का एकमात्र शोध कार्य है.

यायावरी जीवन एक रचनाकार को अनुभवों के संसार से जोड़ता है. डॉ. सुजाता मिश्र को भी विभिन्न स्थानों में रहने और जीवन के नित नए अनुभव प्राप्त करने का अवसर मिला. उन्होंने वर्ष 2012-13 में ग्वालियर स्थित सिंधिया कन्या विद्यालय में बतौर हिंदी शिक्षिका कार्य किया. इसके बाद वे दिल्ली लौट गईं. दिल्ली में रहते हुए कुछ समय तक वहां एक प्रकाशन संस्थान में बतौर एडिटर और कंटेट राईटर काम किया. इस दौरान उन्होंने स्कूली विद्यार्थियों के लिये एनसीआरटी पाठ्यक्रम पर आधारित हिंदी, इतिहास तथा विज्ञान विषय में हिंदी माध्यम की सहायक पुस्तकें तैयार की. वैसे इस दौरान सन् 2008 से लगातार विभिन्न साहित्यिक गतिविधियों में शामिल होते हुए मध्यप्रदेश के विभिन्न शहरों में भ्रमण किया.

सन् 2016 में डॉ. सुजाता का विवाह डॉ. हरिसिंह गौर विश्वविद्यालय, सागर के ई.एम.एम.आर.सी विभाग जो सी.इ.सी-यू जी सी -मानव संसाधन विकास मंत्रालय-मल्टी मीडिया केंद्र है, में प्रोड्यूसर ग्रेड ए अधिकारी कार्यरत् माधव चंद्र चंदेल से हुआ. स्वयं डॉ. सुजाता मिश्र वर्तमान में डॉ. हरिसिंह गौर विश्वविद्यालय सागर से मान्यता प्राप्त बीटी इंस्टीट्यूट ऑफ एक्सीलेंस में हिन्दी विषय की असिस्टेंट प्रोफेसर हैं. उनकी प्रतिभा को देखते हुए इंस्टीट्यूट ने उन्हें सेवा आरम्भ करते ही इंस्टीट्यूट की वार्षिक पत्रिका “स्पंदन“ के प्रथम अंक का सम्पादन कार्य सौंप दिया. पैन्थेर हाउस पब्लिकेशन प्राइवेट लिमिटेड, लखनऊ के लिए संपादन कार्य करते हुए डॉ सुजाता मिश्र ने “दादा साहब फाल्के अकादमी“ पुरस्कार विजेता तथा , “नगीना “ तथा “निगाहें“ फिल्मों के लेखक – निर्माता श्री जगमोहन कपूर के उपन्यास “मलंगी“ का सम्पादन किया. लखनऊ से ही प्रकाशित मासिक पत्रिका “लीटो इंडिया“ में बतौर सम्पादक कार्य किया. मध्यप्रदेश से प्रकाशित देशबन्धु , आचरण आदि समाचार पत्रों सहित राजस्थान से प्रकाशित नव दुनिया, बिहार से प्रकाशित “बिहार टुडे तथा दिल्ली से प्रकाशित न्यूज़ ग्राउंड मासिक पत्रिका के साथ ही साहित्यिक वेबसाईट “शब्दांकन डॉट कॉम“ , “प्रवक्ता डॉट कॉम“ तथा “मेकिंग इंडिया डॉट कॉम“ के लिये शोधपरक लेखन करती हैं. डॉ सुजाता मिश्र का शोध प्रबंध उनकी प्रथम पुस्तक के रूप में “आचार्य विनय मोहन शर्मा एवं उनका साहित्यिक अवदान’’ प्रकाशित हो चुका है.

उल्लेखनीय है कि डॉ सुजाता को अध्ययन ,आध्यापन और लेखन के अतिरिक्त संगीत में विशेष रुचि है. वे सिंथेसाइज़र (की बोर्ड) बजा लेती हैं तथा खना बनाने और बागवानी करने में भी उनकी विशेष रुचि है.

डॉ सुजाता मिश्र के लेखों में उनकी एक मौलिक दृष्टि दिखाई पड़ती है. अपनी लेखनी में एक ओर जहां उन्हें समाज में पड़ रहे पाश्चात्य प्रभाव के दुष्परिणामों से चिंता होती है वहीं दूसरी ओर वे भारतीय संस्कृति की ऐतिहासिक महत्ता पर गर्व झलकता हैं. लेकिन अंधानुकरण नहीं, वे अतीत की त्रुटियों पर भी उंगली उठाने से नहीं हिचकती हैं. इस तारतम्य में अपने लेखों में अद्यतन स्थितियों का आकलन करने के लिए ऐतिहासित एवं पौराणिक आख्यानों का भी संदर्भ लेती हैं. डॉ. सुजाता का एक लेख है ‘हंगामा है क्यों बरपा?’ यह लेख 27 सितम्बर 2018 को धारा 497 को रद्द किए जाने के संदर्भ में है. इस लेख के आरम्भ में ही वे लिखती हैं कि -‘‘ गत 27 सितम्बर 2018 को धारा 497 को रद्द करने वाले अपने ऐतिहासिक फैसला सुनाते जस्टिस आर एफ नरीमन ने तीक्ष्ण टिप्प्णी करते हुए कहा कि – “पत्नी पति की सम्पत्ति नही ंहै”, तब मुझे एकाएक स्मरण हो आया “द्रौपदी” का ! जब स्वयंवर में अपनी धनुष कला के प्रदर्शन से अर्जुन ने द्रौपदी के मन को जीता तब राजा द्रुपद को कहां मालूम रहा होगा कि पुत्री की मनोइच्छा अनुकूल वर तलाशने के लिए किया गया यह आयोजन अतंतः उनकी बेटी को आजीवन ‘बहुपतित्व’ के धर्म निर्वाह की ओर धकेल देगा! माता कुंती के आदेश मात्र पर स्वयंवर की कठिन प्रक्रिया से चुनी गयी अपनी पत्नी द्रौपदी को जब पांचो पांडवो ने आपस में बांट लेने का फैसला लिया तो कैसा लगा होगा द्रौपदी को ? मनोनुकूल वर की चाहत में द्रौपदी को जमीन के एक टुकडे की तरह पांचो ंभाईयो ंके में बांट दिया गया! क्या पित और सास के आदेश पर एक स्त्री का पति के अन्य भाईयो ंको अपना पति मान उनके साथ संबंध बनाना नैतिक, समाजिक और मानवीय दृष्टि से सही था? यदि हां तो सिर्फ अर्जुन की पति होते हुए द्रौपदी अपनी मर्ज़ी से अर्जुन के अन्य भाईयो ंके साथ संबंध बनाती तो क्या इसे भी सही कहा जाता? यह पांडू पुत्रो ंकी “स्वयंवर में जीती द्रौपदी” को अपनी “सम्पत्ति” समझने का ही नतीजा था, जिसके चलते “धर्मराज” माने जाने वाले युधिष्ठिर ने भी द्रौपदी का दांव जुंए में लगा दिया, जिसकी परिणति भरी सभा में द्रौपदी के चीरहरण के रूप में हुई! चीरहरण के इस पाप का दोषी माना गया कौरवों को , जबकि अपनी पत्नी को एक वस्तु समझकर जुएं में हार जाने वाले युधिष्ठिर तो आज भी “धर्मराज” ही कहे जाते हैं!’’

विगत कुछ वर्षों में स्त्रियों ने स्वयं के साथ हुई यौन-प्रताड़ना के विरुद्ध आवाज उठाने का साहस दिखाते हुउ ‘‘हैशटैग मी टू’’ कैम्पेन आरम्भ कियां देखते ही देखते इसने दुनिया की अनेक महिलाओं में नवऊर्जा का संचार किया और वे अपने यौनशोषण की घटनाओं के बारे में खुल कर सामने आ खड़ी हुईं. इसी कैम्पेन के संबंध में डॉ. सुजाता मिश्र का एक लेख है ‘‘ मी टू : क्योंकि सब नहीं चलता’’. इस लेख में डॉ सुजाता ने इस कैम्पेन का अपने ढंग से आकलन किया है. वे अपने इस लेख में लिखती हैं कि -‘‘ खुलापान और मर्यादा एक साथ नही ंचल सकते. स्त्री हो या पुरुष सबको ंअपने दायरे समझने होगें. आज के इस दौर में दोस्त, प्रेमी और सहकर्मियों के साथ अपने रिश्तों के मापदंड हमें खुद निर्धारित करने होगें. और फिर भी यदि कोई उन दायरो ंको तोडने की कोशिश करे तो उसी वक्त अपना विरोध दर्ज करवाना होगा, स्त्री-पुरुष दोनों ही को “सब चलता है” वाला नज़रिया छोडना होगा, क्योंकि सब नहीं चलता. याद रखिए परिस्थितयोंवश भी गलत इंसान की गलत मंशाओं आगे समझौता करने वाला व्यक्ति फिर चाहे वो स्त्री हो या पुरुष सबसे बडा दोषी है. क्योंकि उसकी यही “समझौता प्रवृत्ति” उसको ंभले ही काम और नाम दिला गई हो पर इसके चलते ऐसे तमाम लोग मारे जाते है जो समझौता नहीं करते और कहीं गुमनामी में खो जाते हैं, जबकि शोषक दिन पर दिन ताकतवर बनता जाता है, और शोषित बनकर ही सही ऐसे लोग अपना एक मुकाम बना लेते है. इन्हें तो शायद हिसाब ही नहीं होगा कि इनकी “समझौता प्रवृत्ति” ने कितने मेहनती, ईमानदार, आदर्श लोगो ंको अंधेरो में धकेल दिया.’’

अपने इसी लेख में सुजाता मिश्र भारत में स्त्रियों के साथ होने वाले यौनअपराधों के कारणों की पड़ताल करते हुए निष्कर्ष पर भी विचार करती हैं. वे लिखती हैं कि -‘‘ज्यादातर भारतीय अपना पूरा वक्त दूसरे धर्म-पंथो ंकी कमियां गिनाने में निकाल देते हैं. लेकिन खुद अपने ही धर्म ग्रंथों में आचरण की शुचिता और मर्यादाओ ंपर क्या दिशा-निर्देश दिये गये हें, यह अधिकांश लोग नहीं जानते. कोई भी कानून या सोशल मीडिया मुहिम इन हालातों को तब तक नही ंबदल सकते जब तक बदलाव की बयार हमारे अंदर से न उठे. आरोप-प्रत्यारोप का यह दौर तो गुज़र जायेगा रह जायेगा बाकी तो कुछ सबक केवल. यदि अभी भी न चेते तो कब चेतेंगे? आने वाली पीढ़ियों को सुरक्षित माहौल देना हमारी जिम्मेवारी है. हांलाकि आमतौर पर प्राचीन मर्यादाओ को सदा स्त्री की आज़ादी का विरोधी समझा जाता है, तो बेहतर है समाज के वर्तमान स्वरूप को ध्यान में रखते हुए, लैंगिक समानता के आधार पर नवीन समाजिक-नैतिक दिशा-निर्देश तय हो. जब तक आप संबंधों में उन्मुक्तता का समर्थन करते रहेंगे तब तक इस तरह के अपराध बढ़ते ही रहेंगे.’’

‘‘देश चलाने का टेंडर बनाम लोकतंत्र’’ यह एक अन्य लेख है डॉ सुजाता मिश्र का जिसमें वे भारत में लोकतंत्र के दूषित होते स्वरूप पर कटाक्ष करती हुईं उन खतरे से भी आगाह करती हैं जो सोशल मीडिया अथवा इंटरनेट की ओर से पैदा हो चुका है. अपने इस लेख में उन्होंने वर्तमान दशा-दिशा की बारीकी से व्याख्या की है. इस लेख कर एक अंश देखिए- ‘‘भारत “चुनावों” का देश है ,यहां साल भर ,कहीं न कहीं, किसी न किसी रूप में चुनाव होता ही रहता है. आज़ादी के बाद जो सबसे बडा परिवर्तन देश के राजनीतिक स्वरूप में आया वह था “लोकतंत्र”. लोकतंत्र यानि “जनता पर, जनता द्वारा चुना गया, जनता का शासन”! ऐसी ही अनेक क्रांतिकारी परिभाषाओं से सुसज्जित लोकतंत्र ने कहीं न कहीं आम आदमी को उसकी छुपी हुई ताकत का एहसास कराया, उस आम आदमी को जो बरसों की गुलामी से आज़ाद हुआ था. किंतु वैश्वीकरण के इस दौर में विश्व के अनेक देशों में जहां ‘’राजनीति’’ की परिभाषा बदली वही ं“लोकतंत्र” ने भी अपना स्वरूप बदल लिया, फिर भला हिंदुस्तान इस बदलाव से कैसे दूर रहता? ऐसे में सोचना पडता है कि आज विश्व भर में जिसे हम “लोकतंत्र” कहते हैं वह आखिर “सत्ता का टेंडर” हासिल करने से कुछ ज्यादा है क्या? “लोक” तो जैसे इस “तंत्र” को साधने का एक माध्यम मात्र है.’’

यह कहना अतिशयोक्ति नहीं होगा कि डॉ सुजाता मिश्र एक प्रतिभासम्पन्न युवा लेखिका हैं. उनके लेखन में अपार संभावनाएं निहित हैं. वे एक समालोचक की दृष्टि से तथ्यों को तौलते हुए अपने विचारों को बेलाग सामने रखती हैं. उनका यही लेखकीय गुण एक दिन उन्हें यशस्वी बनाएगा.

             – डॉ . वर्षा सिंह, सागर ( मध्यप्रदेश )