Home धर्म आध्यात्म श्री हनुमान जी ने क्यों लिया पंचमुखी श्री हनुमान का अवतार

श्री हनुमान जी ने क्यों लिया पंचमुखी श्री हनुमान का अवतार

218
0
SHARE
सभी देवताओं में श्री हनुमान जी एक ऐसे देवता है, जो जीवित रूप में इस धरती पर विराजमान है और अपने आराध्य भगवान श्रीराम और अपने भक्तों की सदैव रक्षा करते रहते हैं. श्री हनुमान जी स्मरण मात्र से ही अपने भक्तों के लिए किसी न किसी रूप में दौड़े चले आते हैं. इसीलिए उन्हें जल्द प्रसन्न होनेवाले देवता के रूप में जाना जाता है. अपनी आराधना की तुलना में जो भी भक्त भगवान श्रीराम की आराधना करता है, श्री हनुमान जी उस पर जल्द प्रसन्न होते है, क्योंकि उन्हें लगता है कि जो व्यक्ति मेरे प्रभु श्रीराम का नाम ले रहा है, वह उनके लिए सर्वश्रेष्ठ है. इसलिए श्री हनुमान जी की आराधना के समय उनके नाम के पूर्व भगवान श्रीराम का नाम स्मरण करने से श्री हनुमान जी शीघ्र प्रसन्न होते हैं.
श्री हनुमान जी की किसी भी प्रकार आराधना करने से पूर्व –
ॐ श्री राम दूताय नम:
यह वह मंत्र है, जिसका स्मरण करने से भगवान श्री राम और श्री हनुमान जी दोनों की कृपा प्राप्त होती है. इस मंत्र में दो भाव है. इसमें भगवान श्री राम का भी स्मरण है और श्री हनुमान जी का भी स्मरण है. ‘हे भगवान श्रीराम के दूत, आपको नमस्कार है’. इस मंत्र में भगवान श्रीराम प्रसन्न होते है, क्योंकि भक्त ने उनका नाम लिया है और वह उनके सबसे प्रिय भक्त श्री हनुमान को स्मरण कर रहा है और श्री हनुमान जी प्रसन्न होते है, कि उनके भक्त ने उनका नाम स्मरण करने से पूर्व उनके प्रभु भगवान श्रीराम का नाम स्मरण किया है.
यहां हम आपकाे भगवान श्री हनुमान जी के पंचमुखी अवतार के बारे में बताने का प्रयास कर रहे हैं. श्री हनुमान जी का काफी प्रभावशाली अवतार है श्री पंचमुखी हनुमान. लेकिन श्री पंचमुखी हनुमान की प्रतिमा को घर में लगाने से मना किया गया है, क्योंकि पंचमुखी अवतार श्री हनुमान जी ने अहिरावण का वध करने के लिए धारण किया था. इसलिए इसमें क्रोध का पुट अत्याधिक है. लेकिन पंचमुखी श्री हनुमान की प्रतिमा को घर के द्वार पर लगाना शुभ माना गया है. पंचमुखी श्री हनुमान जी की प्रतिमा घर के द्वार पर लगाने से विशेष रूप से दक्षिण मुखी द्वार पर लगाने से घर में नकारात्मक ऊर्जा प्रवेश नहीं करती, बल्कि सकारात्मक ऊर्जा का प्रवेश घर में होता है. घर के द्वार पर लगी पंचमुखी श्री हनुमान जी की प्रतिमा का रोज पूजन किया जाना चाहिए. रोज संभव न होतो, तो कम से कम मंगलवार और शनिवार के दिन धूप-दीप से पूजन करना चाहिए.
पुराणों में श्री हनुमान जी के पंचमुखी अवतार के बारे में दो कथाएं प्रचलित है.
प्रथम कथा के अनुसार श्रीराम और रावण के बीच युद्ध में जब मेघनाद की मृत्यु हो गयी, तब रावण धैर्य न रख सका और अपनी विजय के उपाय सोचने लगा. तब उसे अपने सहयोगी और पाताल के राक्षसराज अहिरावण की याद आई, जो मां भवानी का परम भक्त होने के साथ साथ तंत्र-मंत्र का ज्ञाता भी था. रावण सीधे देवी मंदिर में जाकर पूजा में तल्लीन हो गया. उसकी आराधना से आकृष्ट होकर अहिरावण वहां पहुंचा. तब रावण ने उससे कहा कि तुम किसी तरह राम और लक्ष्मण को अपनी पुरी में ले जाओ और वहां उनका वध कर डालो. राम-लक्ष्मण के मारे जाने के बाद ये वानर-भालू तो अपने-आप ही भाग जाएंगे.
रावण का आदेश पाने के बाद अहिरावण राम-लक्ष्मण का अपहरण करने के लिए रात के समय निकल पड़ा. लेकिन उसने देखा कि जहां राम-लक्ष्मण विश्राम कर रहे हैं, वहां कड़ा पहरा है और स्वयं श्री हनुमान जी उनके पहरेदार बने हुए है. श्री हनुमानजी ने अपनी पूंछ बढ़ाकर चारों ओर से सबको घेरे में ले लिया. तब अहिरावण ने अपनी माया से सभी को गहरी नींद सुला दिया और स्वयं विभीषण का वेष बनाकर अंदर प्रवेश किया. अहिरावण ने सोते हुए अनंत सौंदर्य के सागर श्रीराम-लक्ष्मण को देखा. दोनों भाइयों के रूप को देख कर वह स्वयं उन पर मोहित हो गया. लेकिन रावण के आदेश का पालन करना था, तब उसने अपनी माया के बल पर भगवान राम की सारी सेना को निंद्रा में डाल दिया तथा राम एवं लक्ष्मण का अपहरण कर उन्हें आकाश मार्ग से पाताललोक ले गया. लेकिन अहिरावण की माया ज्यादा देर कर स्थिर नहीं रह सकी और श्रीराम ओर श्री लक्ष्मण के आकाश में दीव्य प्रकाश से सारी वानर सेना जाग गयी. लेकिन आरंभ में कोई कुछ समझ नहीं सका. लेकिन जब यह पता चला कि श्री राम और श्री लक्ष्मण अपनी कुटिया में नहीं है, तब विभीषण ने यह पहचान लिया कि यह कार्य अहिरावण का है और उन्होंने श्री हनुमानजी को श्रीराम और लक्ष्मण की सहायता करने के लिए पाताललोक जाने को कहा.
– मकरध्वज से युद्ध
श्री हनुमानजी पाताललोक की पूरी जानकारी प्राप्त कर पाताललोक पहुंचे. पाताललोक के द्वार पर उन्हें उनका पुत्र मकरध्वज मिला. श्री हनुमानजी ने आश्चर्यचकित होकर कहा कि श्री हनुमान तो बाल ब्रह्मचारी हैं. तुम उनके पुत्र कैसे? तब मकरध्वज ने बताया कि जब लंकादहन के बाद आप समुद्र में पूंछ बुझाकर स्नान कर रहे थे, तब श्रम के कारण आपके शरीर से स्वेद (पसीना) झर रहा था जिसे एक मछली ने पी लिया. वह मछली पकड़कर जब अहिरावण की रसोई में लाई गयी और उसे काटा गया तो मेरा जन्म हुआ. अहिरावण ने ही मेरा पालन-पोषण किया इसलिए मैं उसके नगर की रक्षा करता हूं. श्री हनुमानजी का मकरध्वज से बाहुयुद्ध हुआ और वे उसे बांधकर देवी मन्दिर पहुंचे जहां श्रीराम और लक्ष्मण की बलि दी जानी थी.
– श्री हनुमान जी को देखते ही अदृश्य हुई देवी
श्री हनुमानजी को देखते ही देवी अदृश्य हो गयीं. लेकिन श्री हनुमान जी को अहिरावण कहीं भी दिखाई नहीं दिया. तब उन्होंने उसका इंतजार करना उचित समझा. श्री हनुमान जी स्वयं देवी के स्थान पर खड़े हो कर अहिरावण की प्रतिक्षा करने लगे. श्री हनुमान जी के इस देवी रूप को रामदूत देवी का रूप माना गया.
श्रीराम-लक्ष्मण की निंद्रा टूटी
जैसे ही श्री हनुमान जी का उस स्थान पर आगमन हुआ, उसी समय श्रीराम और लक्ष्मण की माया निंद्रा टूट गई. उन्होंने स्वयं को अनजानी जगह पर पाया. तब श्रीराम ने लक्ष्मण से कहा ‘आपत्ति के समय सभी प्राणी मेरा स्मरण करते हैं, किन्तु मेरी आपदाओं को दूर करने वाले तो केवल पवनकुमार ही हैं. अत: हम उन्हीं का स्मरण करें.’ लक्ष्मणजी ने कहा कि ‘यहां श्री हनुमान कहां?’ श्रीराम ने कहा ‘पवनपुत्र कहां नहीं हैं? वे तो पृथ्वी के कण-कण में विद्यमान है. मुझे तो देवी के रूप में भी उन्हीं के दर्शन हो रहे हैं.’
– पंचमुखी बन कर पांच दीपक बुझाए
श्री हनुमानजी ने वहां पांच दीपक पांच जगह पर पांच दिशाओं में रखे देखे, जिसे अहिरावण ने मां भवानी की पूजा के लिए जलाया था. ऐसी मान्यता थी कि इन पांचों दीपकों को एक साथ बुझाने पर अहिरावण का वध हो जाएगा. श्री हनुमानजी ने इसी कारण पंचमुखी रूप धरकर वे पांचों दीप बुझा दिए और अहिरावण का वध कर श्रीराम और लक्ष्मण को कंधों पर बैठाकर लंका की ओर उड़ चले.
– पंचमुखी राक्षस का वध
पुराणों में वर्णित एक दूसरी कथा के अनुसार पंचमुखी राक्षस का वध करने के लिए श्री हनुमान जी ने पंचमुखी हनुमान का रूप धारण किया था. ‘श्रीहनुमत महाकाव्य’ के अनुसार एक बार पांच मुख वाला राक्षस भयंकर उत्पात करने लगा. उसे ब्रह्माजी से वरदान मिला था कि उसके जैसे रूप वाला व्यक्ति ही उसे मार सकता है. देवताओं की प्रार्थना पर भगवान ने श्री हनुमानजी को उस राक्षस को मारने की आज्ञा दी. तब श्री हनुमानजी ने वानर, नरसिंह, वराह, हयग्रीव और गरुड़, इन पंचमुख को धारण कर राक्षस का अंत कर दिया.
– मरियल नामक राक्षस का वध
इसी प्रसंग में हमें एक दूसरी कथा भी मिलती है कि एक बार मरियल नाम का दानव भगवान विष्णु का सुदर्शन चक्र चुरा लेता है. यह बात जब श्री हनुमान को पता लगती है, तो वे संकल्प लेते हैं कि वे चक्र पुनः प्राप्त कर भगवान विष्णु को सौंप देंगे.
मरियल दानव को वरदान प्राप्त था कि वह अपनी इच्छानुसार रूप बदल सकता था. अत: विष्णु भगवान ने श्री हनुमानजी को आशीर्वाद दिया. इस आशीर्वाद के कारण श्री हनुमान जी इच्छानुसार वायुगमन की शक्ति के साथ गरुड़-मुख, भय उत्पन्न करने वाला नरसिंह-मुख, हयग्रीव मुख ज्ञान प्राप्त करने के लिए तथा वराह मुख सुख व समृद्धि के लिए था, ये पांच मुख प्राप्त हुए. पार्वती जी ने उन्हें कमल पुष्प एवं यम-धर्मराज ने उन्हें पाश नामक अस्त्र प्रदान किया. आशीर्वाद एवं इन सबकी शक्तियों के साथ श्री हनुमान जी मरियल पर विजय प्राप्त करने में सफल रहे. तभी से उनके इस पंचमुखी स्वरूप को भी मान्यता प्राप्त हुई.
– भगवान शंकर के हैं पांचमुख
माना जाता है कि पंचमुखी श्री हनुमान जी के पांच मुख भगवान शिव के पांच अंश तत्पुरुष, सद्योजात, वामदेव, अघोर व ईशान हैं. उन्हीं शंकरजी के अंशावतार श्री हनुमानजी भी पंचमुखी हैं. मार्गशीर्ष (अगहन) मास की कृष्णपक्ष की अष्टमी तिथि को, पुष्य नक्षत्र में, सिंह लग्न तथा मंगल के दिन पंचमुखी श्री हनुमानजी ने अवतार धारण किया. श्री हनुमानजी का यह स्वरूप सभी प्रकार की सिद्धियों को देने वाला है. श्री हनुमानजी का एकमुखी, पंचमुखी और ग्यारहमुखी स्वरूप ही अधिक प्रचलित हैं.
विराट स्वरूप वाले श्री हनुमानजी के पांचमुख, पन्द्रह नेत्र हैं और दस भुजाएं हैं जिनमें दस आयुध हैं ‘खडग, त्रिशूल, खट्वांग, पाश, अंकुश, पर्वत, सतमभ, मुष्टि, गदा और वृक्ष की डाली. पंचमुखी श्री हनुमानजी का पूर्व की ओर का मुख वानर का है जिसकी प्रभा करोड़ों सूर्य के समान है. वह विकराल दाढ़ों वाला है और उसकी भृकुटियां (भौंहे) चढ़ी हुई हैं.
दक्षिण की ओर वाला मुख नृसिंह भगवान का है. यह अत्यन्त उग्र तेज वाला भयानक है किन्तु शरण में आए हुए के भय को दूर करने वाला है. पश्चिम दिशा वाला मुख गरुड़ का है. इसकी चोंच टेढ़ी है. यह सभी नागों के विष और भूत-प्रेेत को भगाने वाला है. इससे समस्त रोगों का नाश होता है. इनका उत्तर की ओर वाला मुख वाराह (सूकर) का है जिसका आकाश के समान कृष्णवर्ण है. इस मुख के दर्शन से पाताल में रहने वाले जीवों, सिंह व वेताल के भय का और ज्वर का नाश होता है. पंचमुखी श्री हनुमान जी का ऊपर की ओर उठा हुआ मुख हयग्रीव (घोड़े) का है. यह बहुत भयानक है और असुरों का संहार करने वाला है. इसी मुख के द्वारा श्री हनुमानजी ने तारक नामक महादैत्य का वध किया था.
– श्री पंचमुख हनुमा जी की आराधना से मिलते हैं पांच वरदान
श्री हनुमानजी के पंचमुखी विग्रह की आराधना से पांच वरदान प्राप्त होते हैं. नरसिंह मुख की सहायता से शत्रु पर विजय, गरुड़मुख की आराधना से सभी दोषों पर विजय, वराहमुख की सहायता से समस्त प्रकार की समृद्धि तथा हयग्रीव मुख की सहायता से ज्ञान की प्राप्ति होती है. श्री हनुमान मुख से साधक को साहस एवं आत्मविश्वास की प्राप्ति होती है. श्री हनुमानजी के पांचों मुखों में तीन-तीन सुन्दर नेत्र आध्यात्मिक, आधिदैविक तथा आधिभौतिक तापों (काम, क्रोध और लोभ) से छुड़ाने वाले हैं.
– श्री पंचमुखी हनुमान का स्वरूप
श्री पंचमुखी हनुमान पीतांबर और मुकुट से अलंकृत हैं. इनके नेत्र पीले रंग के हैं. इसलिए इन्हें ‘पिंगाक्ष’ कहा जाता है. श्री हनुमानजी के नेत्र अत्यन्त करुणापूर्ण और संकट और चिन्ताओं को दूर कर भक्तों को सुख देने वाले हैं. श्री हनुमानजी के नेत्रों की यही विशेषता है कि वे अपने स्वामी श्रीराम के चरणों के दर्शन के लिए सदैव लालायित रहते हैं. पंचमुखी श्री हनुमानजी सभी सिद्धियों को देने वाले, सभी अमंगलों को हरने वाले तथा सभी प्रकार का मंगल करने वाले मंगल भवन अमंगलहारी हैं.
– पंचमुखी श्री हनुमानजी का द्वादशाक्षर मन्त्र
‘ॐ हं हनुमते रुद्रात्मकाय हुं फट.’
किसी भी पवित्र स्थान पर श्री हनुमानजी के द्वादशाक्षर मन्त्र का एक लाख जप एवं आराधना करने से साधक को सफलता अवश्य मिलती है. ऐसा माना जाता है कि पुर्शचरण पूरा होने पर श्री हनुमानजी अनुष्ठान करने वाले के सामने आधी रात को स्वयं दर्शन देते हैं.
महाकाय महाबल महाबाहु महानख,
महानद महामुख महा मजबूत है.
भनै कवि ‘मान’ महाबीर श्री हनुमान महा-
देवन को देव महाराज रामदूत है.